Book 2 • Chapter 292
Section 292
10 verses
Verse 1
सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे
Verse 2
सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं आए इहाँ कीन्ह भल नाही
Verse 3
रामहि रायँ कहेउ बन जाना कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना
Verse 4
हम अब बन तें बनहि पठाई प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई
Verse 5
तापस मुनि महिसुर सुनि देखी भए प्रेम बस बिकल बिसेषी
Verse 6
समउ समुझि धरि धीरजु राजा चले भरत पहिं सहित समाजा
Verse 7
भरत आइ आगें भइ लीन्हे अवसर सरिस सुआसन दीन्हे
Verse 8
तात भरत कह तेरहुति राऊ तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ
Verse 9
राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु
Verse 10
संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु
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