Book 2 • Chapter 295
Section 295
10 verses
Verse 1
सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही देबि देव सरनागत पाही
Verse 2
फेरि भरत मति करि निज माया पालु बिबुध कुल करि छल छाया
Verse 3
बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी बोली सुर स्वारथ जड़ जानी
Verse 4
मो सन कहहु भरत मति फेरू लोचन सहस न सूझ सुमेरू
Verse 5
बिधि हरि हर माया बड़ि भारी सोउ न भरत मति सकइ निहारी
Verse 6
सो मति मोहि कहत करु भोरी चंदिनि कर कि चंडकर चोरी
Verse 7
भरत हृदयँ सिय राम निवासू तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू
Verse 8
अस कहि सारद गइ बिधि लोका बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका
Verse 9
सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु
Verse 10
रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु
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