Book 2 • Chapter 296
Section 296
10 verses
Verse 1
करि कुचालि सोचत सुरराजू भरत हाथ सबु काजु अकाजू
Verse 2
गए जनकु रघुनाथ समीपा सनमाने सब रबिकुल दीपा
Verse 3
समय समाज धरम अबिरोधा बोले तब रघुबंस पुरोधा
Verse 4
जनक भरत संबादु सुनाई भरत कहाउति कही सुहाई
Verse 5
तात राम जस आयसु देहू सो सबु करै मोर मत एहू
Verse 6
सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी बोले सत्य सरल मृदु बानी
Verse 7
बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू मोर कहब सब भाँति भदेसू
Verse 8
राउर राय रजायसु होई राउरि सपथ सही सिर सोई
Verse 9
राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत
Verse 10
सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत
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