Book 2 • Chapter 299
Section 299
10 verses
Verse 1
राउरि रीति सुबानि बड़ाई जगत बिदित निगमागम गाई
Verse 2
कूर कुटिल खल कुमति कलंकी नीच निसील निरीस निसंकी
Verse 3
तेउ सुनि सरन सामुहें आए सकृत प्रनामु किहें अपनाए
Verse 4
देखि दोष कबहुँ न उर आने सुनि गुन साधु समाज बखाने
Verse 5
को साहिब सेवकहि नेवाजी आपु समाज साज सब साजी
Verse 6
निज करतूति न समुझिअ सपनें सेवक सकुच सोचु उर अपनें
Verse 7
सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी
Verse 8
पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना गुन गति नट पाठक आधीना
Verse 9
यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर
Verse 10
को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर
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