Book 2 • Chapter 304
Section 304
10 verses
Verse 1
भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ लघु मति चापलता कबि छमहूँ
Verse 2
कहत सुनत सति भाउ भरत को सीय राम पद होइ न रत को
Verse 3
सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को
Verse 4
देखि दयाल दसा सबही की राम सुजान जानि जन जी की
Verse 5
धरम धुरीन धीर नय नागर सत्य सनेह सील सुख सागर
Verse 6
देसु काल लखि समउ समाजू नीति प्रीति पालक रघुराजू
Verse 7
बोले बचन बानि सरबसु से हित परिनाम सुनत ससि रसु से
Verse 8
तात भरत तुम्ह धरम धुरीना लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना
Verse 9
करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात
Verse 10
गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात
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