Book 2 • Chapter 305
Section 305
10 verses
Verse 1
जानहु तात तरनि कुल रीती सत्यसंध पितु कीरति प्रीती
Verse 2
समउ समाजु लाज गुरुजन की उदासीन हित अनहित मन की
Verse 3
तुम्हहि बिदित सबही कर करमू आपन मोर परम हित धरमू
Verse 4
मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा तदपि कहउँ अवसर अनुसारा
Verse 5
तात तात बिनु बात हमारी केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी
Verse 6
नतरु प्रजा परिजन परिवारू हमहि सहित सबु होत खुआरू
Verse 7
जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू जग केहि कहहु न होइ कलेसू
Verse 8
तस उतपातु तात बिधि कीन्हा मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा
Verse 9
राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम
Verse 10
गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम
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