Book 2 • Chapter 306
Section 306
10 verses
Verse 1
सहित समाज तुम्हार हमारा घर बन गुर प्रसाद रखवारा
Verse 2
मातु पिता गुर स्वामि निदेसू सकल धरम धरनीधर सेसू
Verse 3
सो तुम्ह करहु करावहु मोहू तात तरनिकुल पालक होहू
Verse 4
साधक एक सकल सिधि देनी कीरति सुगति भूतिमय बेनी
Verse 5
सो बिचारि सहि संकटु भारी करहु प्रजा परिवारु सुखारी
Verse 6
बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई
Verse 7
जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा कुसमयँ तात न अनुचित मोरा
Verse 8
होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए
Verse 9
सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ
Verse 10
तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ
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