Book 2 • Chapter 313
Section 313
10 verses
Verse 1
भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू भरत भूमिसुर तेरहुति राजू
Verse 2
भल दिन आजु जानि मन माहीं रामु कृपाल कहत सकुचाहीं
Verse 3
गुर नृप भरत सभा अवलोकी सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी
Verse 4
सील सराहि सभा सब सोची कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची
Verse 5
भरत सुजान राम रुख देखी उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी
Verse 6
करि दंडवत कहत कर जोरी राखीं नाथ सकल रुचि मोरी
Verse 7
मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू बहुत भाँति दुखु पावा आपू
Verse 8
अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई सेवौं अवध अवधि भरि जाई
Verse 9
जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल
Verse 10
सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल
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