Book 2 • Chapter 314
Section 314
10 verses
Verse 1
पुरजन परिजन प्रजा गोसाई सब सुचि सरस सनेहँ सगाई
Verse 2
राउर बदि भल भव दुख दाहू प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू
Verse 3
स्वामि सुजानु जानि सब ही की रुचि लालसा रहनि जन जी की
Verse 4
प्रनतपालु पालिहि सब काहू देउ दुहू दिसि ओर निबाहू
Verse 5
अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो किएँ बिचारु न सोचु खरो सो
Verse 6
आरति मोर नाथ कर छोहू दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू
Verse 7
यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी तजि सकोच सिखइअ अनुगामी
Verse 8
भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी खीर नीर बिबरन गति हंसी
Verse 9
दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन
Verse 10
देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन
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