Book 2 • Chapter 315
Section 315
10 verses
Verse 1
तात तुम्हारि मोरि परिजन की चिंता गुरहि नृपहि घर बन की
Verse 2
माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू
Verse 3
मोर तुम्हार परम पुरुषारथु स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु
Verse 4
पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई लोक बेद भल भूप भलाई
Verse 5
गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें
Verse 6
अस बिचारि सब सोच बिहाई पालहु अवध अवधि भरि जाई
Verse 7
देसु कोसु परिजन परिवारू गुर पद रजहिं लाग छरुभारू
Verse 8
तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी
Verse 9
मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक
Verse 10
पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक
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