Book 2 • Chapter 316
Section 316
10 verses
Verse 1
राजधरम सरबसु एतनोई जिमि मन माहँ मनोरथ गोई
Verse 2
बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती बिनु अधार मन तोषु न साँती
Verse 3
भरत सील गुर सचिव समाजू सकुच सनेह बिबस रघुराजू
Verse 4
प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं सादर भरत सीस धरि लीन्हीं
Verse 5
चरनपीठ करुनानिधान के जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के
Verse 6
संपुट भरत सनेह रतन के आखर जुग जुन जीव जतन के
Verse 7
कुल कपाट कर कुसल करम के बिमल नयन सेवा सुधरम के
Verse 8
भरत मुदित अवलंब लहे तें अस सुख जस सिय रामु रहे तें
Verse 9
मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ
Verse 10
लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ
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