Book 2 • Chapter 317
Section 317
10 verses
Verse 1
सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी अवधि आस सम जीवनि जी की
Verse 2
नतरु लखन सिय सम बियोगा हहरि मरत सब लोग कुरोगा
Verse 3
रामकृपाँ अवरेब सुधारी बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी
Verse 4
भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो राम प्रेम रसु कहि न परत सो
Verse 5
तन मन बचन उमग अनुरागा धीर धुरंधर धीरजु त्यागा
Verse 6
बारिज लोचन मोचत बारी देखि दसा सुर सभा दुखारी
Verse 7
मुनिगन गुर धुर धीर जनक से ग्यान अनल मन कसें कनक से
Verse 8
जे बिरंचि निरलेप उपाए पदुम पत्र जिमि जग जल जाए
Verse 9
तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार
Verse 10
भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार
0:000:00
Speed: