Book 2 • Chapter 318
Section 318
10 verses
Verse 1
जहाँ जनक गुर मति भोरी प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी
Verse 2
बरनत रघुबर भरत बियोगू सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू
Verse 3
सो सकोच रसु अकथ सुबानी समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी
Verse 4
भेंटि भरत रघुबर समुझाए पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए
Verse 5
सेवक सचिव भरत रुख पाई निज निज काज लगे सब जाई
Verse 6
सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा लगे चलन के साजन साजा
Verse 7
प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई चले सीस धरि राम रजाई
Verse 8
मुनि तापस बनदेव निहोरी सब सनमानि बहोरि बहोरी
Verse 9
लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि
Verse 10
चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि
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