Book 2 • Chapter 37
Section 37
10 verses
Verse 1
राम राम रट बिकल भुआलू जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू
Verse 2
हृदयँ मनाव भोरु जनि होई रामहि जाइ कहै जनि कोई
Verse 3
उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर अवध बिलोकि सूल होइहि उर
Verse 4
भूप प्रीति कैकइ कठिनाई उभय अवधि बिधि रची बनाई
Verse 5
बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा बीना बेनु संख धुनि द्वारा
Verse 6
पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक
Verse 7
मंगल सकल सोहाहिं न कैसें सहगामिनिहि बिभूषन जैसें
Verse 8
तेहिं निसि नीद परी नहि काहू राम दरस लालसा उछाहू
Verse 9
द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि
Verse 10
जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि
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