Book 2 • Chapter 4
Section 4
10 verses
Verse 1
सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी
Verse 2
नाथ रामु करिअहिं जुबराजू कहिअ कृपा करि करिअ समाजू
Verse 3
मोहि अछत यहु होइ उछाहू लहहिं लोग सब लोचन लाहू
Verse 4
प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं यह लालसा एक मन माहीं
Verse 5
पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ
Verse 6
सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए मंगल मोद मूल मन भाए
Verse 7
सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं
Verse 8
भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी रामु पुनीत प्रेम अनुगामी
Verse 9
बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु
Verse 10
सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु
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