Book 2 • Chapter 63
Section 63
10 verses
Verse 1
नर अहार रजनीचर चरहीं कपट बेष बिधि कोटिक करहीं
Verse 2
लागइ अति पहार कर पानी बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी
Verse 3
ब्याल कराल बिहग बन घोरा निसिचर निकर नारि नर चोरा
Verse 4
डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ
Verse 5
हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू
Verse 6
मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली जिअइ कि लवन पयोधि मराली
Verse 7
नव रसाल बन बिहरनसीला सोह कि कोकिल बिपिन करीला
Verse 8
रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी चंदबदनि दुखु कानन भारी
Verse 9
सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि
Verse 10
सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि
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