Book 2 • Chapter 64
Section 64
9 verses
Verse 1
सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के लोचन ललित भरे जल सिय के
Verse 2
सीतल सिख दाहक भइ कैंसें चकइहि सरद चंद निसि जैंसें
Verse 3
उतरु न आव बिकल बैदेही तजन चहत सुचि स्वामि सनेही
Verse 4
बरबस रोकि बिलोचन बारी धरि धीरजु उर अवनिकुमारी
Verse 5
लागि सासु पग कह कर जोरी छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी
Verse 6
दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई जेहि बिधि मोर परम हित होई
Verse 7
मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं
Verse 8
प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान
Verse 9
तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान
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