Book 2 • Chapter 78
Section 78
10 verses
Verse 1
रायँ राम राखन हित लागी बहुत उपाय किए छलु त्यागी
Verse 2
लखी राम रुख रहत न जाने धरम धुरंधर धीर सयाने
Verse 3
तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही
Verse 4
कहि बन के दुख दुसह सुनाए सासु ससुर पितु सुख समुझाए
Verse 5
सिय मनु राम चरन अनुरागा घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा
Verse 6
औरउ सबहिं सीय समुझाई कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई
Verse 7
सचिव नारि गुर नारि सयानी सहित सनेह कहहिं मृदु बानी
Verse 8
तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू
Verse 9
-सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि
Verse 10
सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि
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