Book 2 • Chapter 79
Section 79
10 verses
Verse 1
सीय सकुच बस उतरु न देई सो सुनि तमकि उठी कैकेई
Verse 2
मुनि पट भूषन भाजन आनी आगें धरि बोली मृदु बानी
Verse 3
नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा सील सनेह न छाड़िहि भीरा
Verse 4
सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ
Verse 5
अस बिचारि सोइ करहु जो भावा राम जननि सिख सुनि सुखु पावा
Verse 6
भूपहि बचन बानसम लागे करहिं न प्रान पयान अभागे
Verse 7
लोग बिकल मुरुछित नरनाहू काह करिअ कछु सूझ न काहू
Verse 8
रामु तुरत मुनि बेषु बनाई चले जनक जननिहि सिरु नाई
Verse 9
सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत
Verse 10
बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत
0:000:00
Speed: