Book 2 • Chapter 80
Section 80
10 verses
Verse 1
निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े देखे लोग बिरह दव दाढ़े
Verse 2
कहि प्रिय बचन सकल समुझाए बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए
Verse 3
गुर सन कहि बरषासन दीन्हे आदर दान बिनय बस कीन्हे
Verse 4
जाचक दान मान संतोषे मीत पुनीत प्रेम परितोषे
Verse 5
दासीं दास बोलाइ बहोरी गुरहि सौंपि बोले कर जोरी
Verse 6
सब कै सार सँभार गोसाईं करबि जनक जननी की नाई
Verse 7
बारहिं बार जोरि जुग पानी कहत रामु सब सन मृदु बानी
Verse 8
सोइ सब भाँति मोर हितकारी जेहि तें रहै भुआल सुखारी
Verse 9
मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन
Verse 10
सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन
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