Book 2 • Chapter 81
Section 81
10 verses
Verse 1
एहि बिधि राम सबहि समुझावा गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा
Verse 2
गनपती गौरि गिरीसु मनाई चले असीस पाइ रघुराई
Verse 3
राम चलत अति भयउ बिषादू सुनि न जाइ पुर आरत नादू
Verse 4
कुसगुन लंक अवध अति सोकू हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू
Verse 5
गइ मुरुछा तब भूपति जागे बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे
Verse 6
रामु चले बन प्रान न जाहीं केहि सुख लागि रहत तन माहीं
Verse 7
एहि तें कवन ब्यथा बलवाना जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना
Verse 8
पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू
Verse 9
-सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि
Verse 10
रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि
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