Book 2 • Chapter 85
Section 85
10 verses
Verse 1
रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी
Verse 2
करुनामय रघुनाथ गोसाँई बेगि पाइअहिं पीर पराई
Verse 3
कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए बहुबिधि राम लोग समुझाए
Verse 4
किए धरम उपदेस घनेरे लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे
Verse 5
सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई असमंजस बस भे रघुराई
Verse 6
लोग सोग श्रम बस गए सोई कछुक देवमायाँ मति मोई
Verse 7
जबहिं जाम जुग जामिनि बीती राम सचिव सन कहेउ सप्रीती
Verse 8
खोज मारि रथु हाँकहु ताता आन उपायँ बनिहि नहिं बाता
Verse 9
राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ
Verse 10
सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ
0:000:00
Speed: