Book 2 • Chapter 89
Section 89
10 verses
Verse 1
राम लखन सिय रूप निहारी कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी
Verse 2
ते पितु मातु कहहु सखि कैसे जिन्ह पठए बन बालक ऐसे
Verse 3
एक कहहिं भल भूपति कीन्हा लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा
Verse 4
तब निषादपति उर अनुमाना तरु सिंसुपा मनोहर जाना
Verse 5
लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा कहेउ राम सब भाँति सुहावा
Verse 6
पुरजन करि जोहारु घर आए रघुबर संध्या करन सिधाए
Verse 7
गुहँ सँवारि साँथरी डसाई कुस किसलयमय मृदुल सुहाई
Verse 8
सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी दोना भरि भरि राखेसि पानी
Verse 9
सिय सुमंत्र भ्राता सहित कंद मूल फल खाइ
Verse 10
सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ
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