Book 2 • Chapter 92
Section 92
10 verses
Verse 1
भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी
Verse 2
भयउ बिषादु निषादहि भारी राम सीय महि सयन निहारी
Verse 3
बोले लखन मधुर मृदु बानी ग्यान बिराग भगति रस सानी
Verse 4
काहु न कोउ सुख दुख कर दाता निज कृत करम भोग सबु भ्राता
Verse 5
जोग बियोग भोग भल मंदा हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा
Verse 6
जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू संपती बिपति करमु अरु कालू
Verse 7
धरनि धामु धनु पुर परिवारू सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू
Verse 8
देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं मोह मूल परमारथु नाहीं
Verse 9
सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ
Verse 10
जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ
0:000:00
Speed: