Book 1 • Chapter 104
Section 104
10 verses
Verse 1
संभु चरित सुनि सरस सुहावा भरद्वाज मुनि अति सुख पावा
Verse 2
बहु लालसा कथा पर बाढ़ी नयनन्हि नीरु रोमावलि ठाढ़ी
Verse 3
प्रेम बिबस मुख आव न बानी दसा देखि हरषे मुनि ग्यानी
Verse 4
अहो धन्य तव जन्मु मुनीसा तुम्हहि प्रान सम प्रिय गौरीसा
Verse 5
सिव पद कमल जिन्हहि रति नाहीं रामहि ते सपनेहुँ न सोहाहीं
Verse 6
बिनु छल बिस्वनाथ पद नेहू राम भगत कर लच्छन एहू
Verse 7
सिव सम को रघुपति ब्रतधारी बिनु अघ तजी सती असि नारी
Verse 8
पनु करि रघुपति भगति देखाई को सिव सम रामहि प्रिय भाई
Verse 9
प्रथमहिं मै कहि सिव चरित बूझा मरमु तुम्हार
Verse 10
सुचि सेवक तुम्ह राम के रहित समस्त बिकार
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