Book 1 • Chapter 105
Section 105
10 verses
Verse 1
मैं जाना तुम्हार गुन सीला कहउँ सुनहु अब रघुपति लीला
Verse 2
सुनु मुनि आजु समागम तोरें कहि न जाइ जस सुखु मन मोरें
Verse 3
राम चरित अति अमित मुनिसा कहि न सकहिं सत कोटि अहीसा
Verse 4
तदपि जथाश्रुत कहउँ बखानी सुमिरि गिरापति प्रभु धनुपानी
Verse 5
सारद दारुनारि सम स्वामी रामु सूत्रधर अंतरजामी
Verse 6
जेहि पर कृपा करहिं जनु जानी कबि उर अजिर नचावहिं बानी
Verse 7
प्रनवउँ सोइ कृपाल रघुनाथा बरनउँ बिसद तासु गुन गाथा
Verse 8
परम रम्य गिरिबरु कैलासू सदा जहाँ सिव उमा निवासू
Verse 9
सिद्ध तपोधन जोगिजन सूर किंनर मुनिबृंद
Verse 10
बसहिं तहाँ सुकृती सकल सेवहिं सिब सुखकंद
0:000:00
Speed: