Book 1 • Chapter 109
Section 109
10 verses
Verse 1
जौं अनीह ब्यापक बिभु कोऊ कबहु बुझाइ नाथ मोहि सोऊ
Verse 2
अग्य जानि रिस उर जनि धरहू जेहि बिधि मोह मिटै सोइ करहू
Verse 3
मै बन दीखि राम प्रभुताई अति भय बिकल न तुम्हहि सुनाई
Verse 4
तदपि मलिन मन बोधु न आवा सो फलु भली भाँति हम पावा
Verse 5
अजहूँ कछु संसउ मन मोरे करहु कृपा बिनवउँ कर जोरें
Verse 6
प्रभु तब मोहि बहु भाँति प्रबोधा नाथ सो समुझि करहु जनि क्रोधा
Verse 7
तब कर अस बिमोह अब नाहीं रामकथा पर रुचि मन माहीं
Verse 8
कहहु पुनीत राम गुन गाथा भुजगराज भूषन सुरनाथा
Verse 9
बंदउ पद धरि धरनि सिरु बिनय करउँ कर जोरि
Verse 10
बरनहु रघुबर बिसद जसु श्रुति सिद्धांत निचोरि
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