Book 1 • Chapter 11
Section 11
11 verses
Verse 1
मनि मानिक मुकुता छबि जैसी अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी
Verse 2
नृप किरीट तरुनी तनु पाई लहहिं सकल सोभा अधिकाई
Verse 3
तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं
Verse 4
भगति हेतु बिधि भवन बिहाई सुमिरत सारद आवति धाई
Verse 5
राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ
Verse 6
कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी गावहिं हरि जस कलि मल हारी
Verse 7
कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना सिर धुनि गिरा लगत पछिताना
Verse 8
हृदय सिंधु मति सीप समाना स्वाति सारदा कहहिं सुजाना
Verse 9
जौं बरषइ बर बारि बिचारू होहिं कबित मुकुतामनि चारू
Verse 10
जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग
Verse 11
पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग
0:000:00
Speed: