Book 1 • Chapter 12
Section 12
14 verses
Verse 1
जे जनमे कलिकाल कराला करतब बायस बेष मराला
Verse 2
चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें
Verse 3
बंचक भगत कहाइ राम के किंकर कंचन कोह काम के
Verse 4
तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी धींग धरमध्वज धंधक धोरी
Verse 5
जौं अपने अवगुन सब कहऊँ बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ
Verse 6
ताते मैं अति अलप बखाने थोरे महुँ जानिहहिं सयाने
Verse 7
समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी
Verse 8
एतेहु पर करिहहिं जे असंका मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका
Verse 9
कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ मति अनुरूप राम गुन गावउँ
Verse 10
कहँ रघुपति के चरित अपारा कहँ मति मोरि निरत संसारा
Verse 11
जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं कहहु तूल केहि लेखे माहीं
Verse 12
समुझत अमित राम प्रभुताई करत कथा मन अति कदराई
Verse 13
सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान
Verse 14
नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान
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