Book 1 • Chapter 131
Section 131
10 verses
Verse 1
देखि रूप मुनि बिरति बिसारी बड़ी बार लगि रहे निहारी
Verse 2
लच्छन तासु बिलोकि भुलाने हृदयँ हरष नहिं प्रगट बखाने
Verse 3
जो एहि बरइ अमर सोइ होई समरभूमि तेहि जीत न कोई
Verse 4
सेवहिं सकल चराचर ताही बरइ सीलनिधि कन्या जाही
Verse 5
लच्छन सब बिचारि उर राखे कछुक बनाइ भूप सन भाषे
Verse 6
सुता सुलच्छन कहि नृप पाहीं नारद चले सोच मन माहीं
Verse 7
करौं जाइ सोइ जतन बिचारी जेहि प्रकार मोहि बरै कुमारी
Verse 8
जप तप कछु न होइ तेहि काला हे बिधि मिलइ कवन बिधि बाला
Verse 9
एहि अवसर चाहिअ परम सोभा रूप बिसाल
Verse 10
जो बिलोकि रीझै कुअँरि तब मेलै जयमाल
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