Book 1 • Chapter 132
Section 132
10 verses
Verse 1
हरि सन मागौं सुंदरताई होइहि जात गहरु अति भाई
Verse 2
मोरें हित हरि सम नहिं कोऊ एहि अवसर सहाय सोइ होऊ
Verse 3
बहुबिधि बिनय कीन्हि तेहि काला प्रगटेउ प्रभु कौतुकी कृपाला
Verse 4
प्रभु बिलोकि मुनि नयन जुड़ाने होइहि काजु हिएँ हरषाने
Verse 5
अति आरति कहि कथा सुनाई करहु कृपा करि होहु सहाई
Verse 6
आपन रूप देहु प्रभु मोही आन भाँति नहिं पावौं ओही
Verse 7
जेहि बिधि नाथ होइ हित मोरा करहु सो बेगि दास मैं तोरा
Verse 8
निज माया बल देखि बिसाला हियँ हँसि बोले दीनदयाला
Verse 9
जेहि बिधि होइहि परम हित नारद सुनहु तुम्हार
Verse 10
सोइ हम करब न आन कछु बचन न मृषा हमार
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