Book 1 • Chapter 133
Section 133
10 verses
Verse 1
कुपथ माग रुज ब्याकुल रोगी बैद न देइ सुनहु मुनि जोगी
Verse 2
एहि बिधि हित तुम्हार मैं ठयऊ कहि अस अंतरहित प्रभु भयऊ
Verse 3
माया बिबस भए मुनि मूढ़ा समुझी नहिं हरि गिरा निगूढ़ा
Verse 4
गवने तुरत तहाँ रिषिराई जहाँ स्वयंबर भूमि बनाई
Verse 5
निज निज आसन बैठे राजा बहु बनाव करि सहित समाजा
Verse 6
मुनि मन हरष रूप अति मोरें मोहि तजि आनहि बारिहि न भोरें
Verse 7
मुनि हित कारन कृपानिधाना दीन्ह कुरूप न जाइ बखाना
Verse 8
सो चरित्र लखि काहुँ न पावा नारद जानि सबहिं सिर नावा
Verse 9
रहे तहाँ दुइ रुद्र गन ते जानहिं सब भेउ
Verse 10
बिप्रबेष देखत फिरहिं परम कौतुकी तेउ
0:000:00
Speed: