Book 1 • Chapter 134
Section 134
10 verses
Verse 1
जेंहि समाज बैंठे मुनि जाई हृदयँ रूप अहमिति अधिकाई
Verse 2
तहँ बैठ महेस गन दोऊ बिप्रबेष गति लखइ न कोऊ
Verse 3
करहिं कूटि नारदहि सुनाई नीकि दीन्हि हरि सुंदरताई
Verse 4
रीझहि राजकुअँरि छबि देखी इन्हहि बरिहि हरि जानि बिसेषी
Verse 5
मुनिहि मोह मन हाथ पराएँ हँसहिं संभु गन अति सचु पाएँ
Verse 6
जदपि सुनहिं मुनि अटपटि बानी समुझि न परइ बुद्धि भ्रम सानी
Verse 7
काहुँ न लखा सो चरित बिसेषा सो सरूप नृपकन्याँ देखा
Verse 8
मर्कट बदन भयंकर देही देखत हृदयँ क्रोध भा तेही
Verse 9
सखीं संग लै कुअँरि तब चलि जनु राजमराल
Verse 10
देखत फिरइ महीप सब कर सरोज जयमाल
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