Book 1 • Chapter 136
Section 136
10 verses
Verse 1
पुनि जल दीख रूप निज पावा तदपि हृदयँ संतोष न आवा
Verse 2
फरकत अधर कोप मन माहीं सपदी चले कमलापति पाहीं
Verse 3
देहउँ श्राप कि मरिहउँ जाई जगत मोर उपहास कराई
Verse 4
बीचहिं पंथ मिले दनुजारी संग रमा सोइ राजकुमारी
Verse 5
बोले मधुर बचन सुरसाईं मुनि कहँ चले बिकल की नाईं
Verse 6
सुनत बचन उपजा अति क्रोधा माया बस न रहा मन बोधा
Verse 7
पर संपदा सकहु नहिं देखी तुम्हरें इरिषा कपट बिसेषी
Verse 8
मथत सिंधु रुद्रहि बौरायहु सुरन्ह प्रेरी बिष पान करायहु
Verse 9
असुर सुरा बिष संकरहि आपु रमा मनि चारु
Verse 10
स्वारथ साधक कुटिल तुम्ह सदा कपट ब्यवहारु
0:000:00
Speed: