Book 1 • Chapter 138
Section 138
10 verses
Verse 1
जब हरि माया दूरि निवारी नहिं तहँ रमा न राजकुमारी
Verse 2
तब मुनि अति सभीत हरि चरना गहे पाहि प्रनतारति हरना
Verse 3
मृषा होउ मम श्राप कृपाला मम इच्छा कह दीनदयाला
Verse 4
मैं दुर्बचन कहे बहुतेरे कह मुनि पाप मिटिहिं किमि मेरे
Verse 5
जपहु जाइ संकर सत नामा होइहि हृदयँ तुरंत बिश्रामा
Verse 6
कोउ नहिं सिव समान प्रिय मोरें असि परतीति तजहु जनि भोरें
Verse 7
जेहि पर कृपा न करहिं पुरारी सो न पाव मुनि भगति हमारी
Verse 8
अस उर धरि महि बिचरहु जाई अब न तुम्हहि माया निअराई
Verse 9
बहुबिधि मुनिहि प्रबोधि प्रभु तब भए अंतरधान
Verse 10
सत्यलोक नारद चले करत राम गुन गान
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