Book 1 • Chapter 140
Section 140
10 verses
Verse 1
एहि बिधि जनम करम हरि केरे सुंदर सुखद बिचित्र घनेरे
Verse 2
कलप कलप प्रति प्रभु अवतरहीं चारु चरित नानाबिधि करहीं
Verse 3
तब तब कथा मुनीसन्ह गाई परम पुनीत प्रबंध बनाई
Verse 4
बिबिध प्रसंग अनूप बखाने करहिं न सुनि आचरजु सयाने
Verse 5
हरि अनंत हरिकथा अनंता कहहिं सुनहिं बहुबिधि सब संता
Verse 6
रामचंद्र के चरित सुहाए कलप कोटि लगि जाहिं न गाए
Verse 7
यह प्रसंग मैं कहा भवानी हरिमायाँ मोहहिं मुनि ग्यानी
Verse 8
प्रभु कौतुकी प्रनत हितकारी सेवत सुलभ सकल दुख हारी
Verse 9
सुर नर मुनि कोउ नाहिं जेहि न मोह माया प्रबल
Verse 10
अस बिचारि मन माहिं भजिअ महामाया पतिहि
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