Book 1 • Chapter 150
Section 150
10 verses
Verse 1
देखि प्रीति सुनि बचन अमोले एवमस्तु करुनानिधि बोले
Verse 2
आपु सरिस खोजौं कहँ जाई नृप तव तनय होब मैं आई
Verse 3
सतरूपहि बिलोकि कर जोरें देबि मागु बरु जो रुचि तोरे
Verse 4
जो बरु नाथ चतुर नृप मागा सोइ कृपाल मोहि अति प्रिय लागा
Verse 5
प्रभु परंतु सुठि होति ढिठाई जदपि भगत हित तुम्हहि सोहाई
Verse 6
तुम्ह ब्रह्मादि जनक जग स्वामी ब्रह्म सकल उर अंतरजामी
Verse 7
अस समुझत मन संसय होई कहा जो प्रभु प्रवान पुनि सोई
Verse 8
जे निज भगत नाथ तव अहहीं जो सुख पावहिं जो गति लहहीं
Verse 9
सोइ सुख सोइ गति सोइ भगति सोइ निज चरन सनेहु
Verse 10
सोइ बिबेक सोइ रहनि प्रभु हमहि कृपा करि देहु
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