Book 1 • Chapter 151
Section 151
10 verses
Verse 1
सुनु मृदु गूढ़ रुचिर बर रचना कृपासिंधु बोले मृदु बचना
Verse 2
जो कछु रुचि तुम्हेर मन माहीं मैं सो दीन्ह सब संसय नाहीं
Verse 3
मातु बिबेक अलोकिक तोरें कबहुँ न मिटिहि अनुग्रह मोरें
Verse 4
बंदि चरन मनु कहेउ बहोरी अवर एक बिनति प्रभु मोरी
Verse 5
सुत बिषइक तव पद रति होऊ मोहि बड़ मूढ़ कहै किन कोऊ
Verse 6
मनि बिनु फनि जिमि जल बिनु मीना मम जीवन तिमि तुम्हहि अधीना
Verse 7
अस बरु मागि चरन गहि रहेऊ एवमस्तु करुनानिधि कहेऊ
Verse 8
अब तुम्ह मम अनुसासन मानी बसहु जाइ सुरपति रजधानी
Verse 9
तहँ करि भोग बिसाल तात गउँ कछु काल पुनि
Verse 10
होइहहु अवध भुआल तब मैं होब तुम्हार सुत
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