Book 1 • Chapter 153
Section 153
10 verses
Verse 1
सुनु मुनि कथा पुनीत पुरानी जो गिरिजा प्रति संभु बखानी
Verse 2
बिस्व बिदित एक कैकय देसू सत्यकेतु तहँ बसइ नरेसू
Verse 3
धरम धुरंधर नीति निधाना तेज प्रताप सील बलवाना
Verse 4
तेहि कें भए जुगल सुत बीरा सब गुन धाम महा रनधीरा
Verse 5
राज धनी जो जेठ सुत आही नाम प्रतापभानु अस ताही
Verse 6
अपर सुतहि अरिमर्दन नामा भुजबल अतुल अचल संग्रामा
Verse 7
भाइहि भाइहि परम समीती सकल दोष छल बरजित प्रीती
Verse 8
जेठे सुतहि राज नृप दीन्हा हरि हित आपु गवन बन कीन्हा
Verse 9
जब प्रतापरबि भयउ नृप फिरी दोहाई देस
Verse 10
प्रजा पाल अति बेदबिधि कतहुँ नहीं अघ लेस
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