Book 1 • Chapter 155
Section 155
10 verses
Verse 1
भूप प्रतापभानु बल पाई कामधेनु भै भूमि सुहाई
Verse 2
सब दुख बरजित प्रजा सुखारी धरमसील सुंदर नर नारी
Verse 3
सचिव धरमरुचि हरि पद प्रीती नृप हित हेतु सिखव नित नीती
Verse 4
गुर सुर संत पितर महिदेवा करइ सदा नृप सब कै सेवा
Verse 5
भूप धरम जे बेद बखाने सकल करइ सादर सुख माने
Verse 6
दिन प्रति देह बिबिध बिधि दाना सुनहु सास्त्र बर बेद पुराना
Verse 7
नाना बापीं कूप तड़ागा सुमन बाटिका सुंदर बागा
Verse 8
बिप्रभवन सुरभवन सुहाए सब तीरथन्ह बिचित्र बनाए
Verse 9
जँह लगि कहे पुरान श्रुति एक एक सब जाग
Verse 10
बार सहस्त्र सहस्त्र नृप किए सहित अनुराग
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