Book 1 • Chapter 167
Section 167
10 verses
Verse 1
सुनु नृप बिबिध जतन जग माहीं कष्टसाध्य पुनि होहिं कि नाहीं
Verse 2
अहइ एक अति सुगम उपाई तहाँ परंतु एक कठिनाई
Verse 3
मम आधीन जुगुति नृप सोई मोर जाब तव नगर न होई
Verse 4
आजु लगें अरु जब तें भयऊँ काहू के गृह ग्राम न गयऊँ
Verse 5
जौं न जाउँ तव होइ अकाजू बना आइ असमंजस आजू
Verse 6
सुनि महीस बोलेउ मृदु बानी नाथ निगम असि नीति बखानी
Verse 7
बड़े सनेह लघुन्ह पर करहीं गिरि निज सिरनि सदा तृन धरहीं
Verse 8
जलधि अगाध मौलि बह फेनू संतत धरनि धरत सिर रेनू
Verse 9
अस कहि गहे नरेस पद स्वामी होहु कृपाल
Verse 10
मोहि लागि दुख सहिअ प्रभु सज्जन दीनदयाल
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