Book 1 • Chapter 202
Section 202
10 verses
Verse 1
अगनित रबि ससि सिव चतुरानन बहु गिरि सरित सिंधु महि कानन
Verse 2
काल कर्म गुन ग्यान सुभाऊ सोउ देखा जो सुना न काऊ
Verse 3
देखी माया सब बिधि गाढ़ी अति सभीत जोरें कर ठाढ़ी
Verse 4
देखा जीव नचावइ जाही देखी भगति जो छोरइ ताही
Verse 5
तन पुलकित मुख बचन न आवा नयन मूदि चरननि सिरु नावा
Verse 6
बिसमयवंत देखि महतारी भए बहुरि सिसुरूप खरारी
Verse 7
अस्तुति करि न जाइ भय माना जगत पिता मैं सुत करि जाना
Verse 8
हरि जननि बहुबिधि समुझाई यह जनि कतहुँ कहसि सुनु माई
Verse 9
बार बार कौसल्या बिनय करइ कर जोरि
Verse 10
अब जनि कबहूँ ब्यापै प्रभु मोहि माया तोरि
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