Book 1 • Chapter 231
Section 231
10 verses
Verse 1
तात जनकतनया यह सोई धनुषजग्य जेहि कारन होई
Verse 2
पूजन गौरि सखीं लै आई करत प्रकासु फिरइ फुलवाई
Verse 3
जासु बिलोकि अलोकिक सोभा सहज पुनीत मोर मनु छोभा
Verse 4
सो सबु कारन जान बिधाता फरकहिं सुभद अंग सुनु भ्राता
Verse 5
रघुबंसिन्ह कर सहज सुभाऊ मनु कुपंथ पगु धरइ न काऊ
Verse 6
मोहि अतिसय प्रतीति मन केरी जेहिं सपनेहुँ परनारि न हेरी
Verse 7
जिन्ह कै लहहिं न रिपु रन पीठी नहिं पावहिं परतिय मनु डीठी
Verse 8
मंगन लहहि न जिन्ह कै नाहीं ते नरबर थोरे जग माहीं
Verse 9
करत बतकहि अनुज सन मन सिय रूप लोभान
Verse 10
मुख सरोज मकरंद छबि करइ मधुप इव पान
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