Book 1 • Chapter 245
Section 245
10 verses
Verse 1
प्रभुहि देखि सब नृप हिंयँ हारे जनु राकेस उदय भएँ तारे
Verse 2
असि प्रतीति सब के मन माहीं राम चाप तोरब सक नाहीं
Verse 3
बिनु भंजेहुँ भव धनुषु बिसाला मेलिहि सीय राम उर माला
Verse 4
अस बिचारि गवनहु घर भाई जसु प्रतापु बलु तेजु गवाँई
Verse 5
बिहसे अपर भूप सुनि बानी जे अबिबेक अंध अभिमानी
Verse 6
तोरेहुँ धनुषु ब्याहु अवगाहा बिनु तोरें को कुअँरि बिआहा
Verse 7
एक बार कालउ किन होऊ सिय हित समर जितब हम सोऊ
Verse 8
यह सुनि अवर महिप मुसकाने धरमसील हरिभगत सयाने
Verse 9
सीय बिआहबि राम गरब दूरि करि नृपन्ह के
Verse 10
जीति को सक संग्राम दसरथ के रन बाँकुरे
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