Book 1 • Chapter 247
Section 247
10 verses
Verse 1
सिय सोभा नहिं जाइ बखानी जगदंबिका रूप गुन खानी
Verse 2
उपमा सकल मोहि लघु लागीं प्राकृत नारि अंग अनुरागीं
Verse 3
सिय बरनिअ तेइ उपमा देई कुकबि कहाइ अजसु को लेई
Verse 4
जौ पटतरिअ तीय सम सीया जग असि जुबति कहाँ कमनीया
Verse 5
गिरा मुखर तन अरध भवानी रति अति दुखित अतनु पति जानी
Verse 6
बिष बारुनी बंधु प्रिय जेही कहिअ रमासम किमि बैदेही
Verse 7
जौ छबि सुधा पयोनिधि होई परम रूपमय कच्छप सोई
Verse 8
सोभा रजु मंदरु सिंगारू मथै पानि पंकज निज मारू
Verse 9
एहि बिधि उपजै लच्छि जब सुंदरता सुख मूल
Verse 10
तदपि सकोच समेत कबि कहहिं सीय समतूल
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