Book 1 • Chapter 250
Section 250
10 verses
Verse 1
नृप भुजबल बिधु सिवधनु राहू गरुअ कठोर बिदित सब काहू
Verse 2
रावनु बानु महाभट भारे देखि सरासन गवँहिं सिधारे
Verse 3
सोइ पुरारि कोदंडु कठोरा राज समाज आजु जोइ तोरा
Verse 4
त्रिभुवन जय समेत बैदेही बिनहिं बिचार बरइ हठि तेही
Verse 5
सुनि पन सकल भूप अभिलाषे भटमानी अतिसय मन माखे
Verse 6
परिकर बाँधि उठे अकुलाई चले इष्टदेवन्ह सिर नाई
Verse 7
तमकि ताकि तकि सिवधनु धरहीं उठइ न कोटि भाँति बलु करहीं
Verse 8
जिन्ह के कछु बिचारु मन माहीं चाप समीप महीप न जाहीं
Verse 9
तमकि धरहिं धनु मूढ़ नृप उठइ न चलहिं लजाइ
Verse 10
मनहुँ पाइ भट बाहुबलु अधिकु अधिकु गरुआइ
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