Book 1 • Chapter 264
Section 264
10 verses
Verse 1
सखिन्ह मध्य सिय सोहति कैसे छबिगन मध्य महाछबि जैसें
Verse 2
कर सरोज जयमाल सुहाई बिस्व बिजय सोभा जेहिं छाई
Verse 3
तन सकोचु मन परम उछाहू गूढ़ प्रेमु लखि परइ न काहू
Verse 4
जाइ समीप राम छबि देखी रहि जनु कुँअरि चित्र अवरेखी
Verse 5
चतुर सखीं लखि कहा बुझाई पहिरावहु जयमाल सुहाई
Verse 6
सुनत जुगल कर माल उठाई प्रेम बिबस पहिराइ न जाई
Verse 7
सोहत जनु जुग जलज सनाला ससिहि सभीत देत जयमाला
Verse 8
गावहिं छबि अवलोकि सहेली सियँ जयमाल राम उर मेली
Verse 9
रघुबर उर जयमाल देखि देव बरिसहिं सुमन
Verse 10
सकुचे सकल भुआल जनु बिलोकि रबि कुमुदगन
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