Book 1 • Chapter 281
Section 281
10 verses
Verse 1
बंधु कहइ कटु संमत तोरें तू छल बिनय करसि कर जोरें
Verse 2
करु परितोषु मोर संग्रामा नाहिं त छाड़ कहाउब रामा
Verse 3
छलु तजि करहि समरु सिवद्रोही बंधु सहित न त मारउँ तोही
Verse 4
भृगुपति बकहिं कुठार उठाएँ मन मुसकाहिं रामु सिर नाएँ
Verse 5
गुनह लखन कर हम पर रोषू कतहुँ सुधाइहु ते बड़ दोषू
Verse 6
टेढ़ जानि सब बंदइ काहू बक्र चंद्रमहि ग्रसइ न राहू
Verse 7
राम कहेउ रिस तजिअ मुनीसा कर कुठारु आगें यह सीसा
Verse 8
जेंहिं रिस जाइ करिअ सोइ स्वामी मोहि जानि आपन अनुगामी
Verse 9
प्रभुहि सेवकहि समरु कस तजहु बिप्रबर रोसु
Verse 10
बेषु बिलोकें कहेसि कछु बालकहू नहिं दोसु
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