Book 1 • Chapter 3
Section 3
16 verses
Verse 1
मज्जन फल पेखिअ ततकाला काक होहिं पिक बकउ मराला
Verse 2
सुनि आचरज करै जनि कोई सतसंगति महिमा नहिं गोई
Verse 3
बालमीक नारद घटजोनी निज निज मुखनि कही निज होनी
Verse 4
जलचर थलचर नभचर नाना जे जड़ चेतन जीव जहाना
Verse 5
मति कीरति गति भूति भलाई जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई
Verse 6
सो जानब सतसंग प्रभाऊ लोकहुँ बेद न आन उपाऊ
Verse 7
बिनु सतसंग बिबेक न होई राम कृपा बिनु सुलभ न सोई
Verse 8
सतसंगत मुद मंगल मूला सोइ फल सिधि सब साधन फूला
Verse 9
सठ सुधरहिं सतसंगति पाई पारस परस कुधात सुहाई
Verse 10
बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं
Verse 11
बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी कहत साधु महिमा सकुचानी
Verse 12
सो मो सन कहि जात न कैसें साक बनिक मनि गुन गन जैसें
Verse 13
बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ
Verse 14
अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ 3(क)
Verse 15
संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु
Verse 16
बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु 3(ख)
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