Book 1 • Chapter 4
Section 4
13 verses
Verse 1
बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ
Verse 2
पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें उजरें हरष बिषाद बसेरें
Verse 3
हरि हर जस राकेस राहु से पर अकाज भट सहसबाहु से
Verse 4
जे पर दोष लखहिं सहसाखी पर हित घृत जिन्ह के मन माखी
Verse 5
तेज कृसानु रोष महिषेसा अघ अवगुन धन धनी धनेसा
Verse 6
उदय केत सम हित सबही के कुंभकरन सम सोवत नीके
Verse 7
पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं
Verse 8
बंदउँ खल जस सेष सरोषा सहस बदन बरनइ पर दोषा
Verse 9
पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना पर अघ सुनइ सहस दस काना
Verse 10
बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही संतत सुरानीक हित जेही
Verse 11
बचन बज्र जेहि सदा पिआरा सहस नयन पर दोष निहारा
Verse 12
उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति
Verse 13
जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति
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